जल संकट से जूझती धरती जल के बारे में नहीं सोचा गया तो जीवन संकट में पर सकता
है। घरेलू सवास्थ संबंधित सर सफाई के लिए जल की अव्सकता पड़ती है। आसानी से उपलब्ध
जल को बर्बादी से रोकना चाहिए दो हज़ार बतीस (2032) के आकडे के अनुसार विश्व का हर
आदमी जल की कमी अनुभव करेगा।
इस तरह से जल पर नहीं सोचा गया तो वह दिन दूर नहीं जब तीसरा महायुद्ध जल के
लिए ही लड़ा जायेगा। दूर दूर तक बाल्टी ले कर पानी की तलाश करना पड़ेगा मिलों दूर तक
भी जल का नामो निशान नहीं होगा। जल का आकाल इस तरह से सुरसा की तरह मुख फैलाते चला
जा रहा है की देखते देखते हजारों हजार, लाखों
- लाख लीटर जल रखने वाला जलाशय सुख गए है। नदियों को तो और भी हाल बुरा है। गंगा,
जमुना, सतलज आदि नदियाँ जल को तरस रही है। पर्यावरण के साथ- साथ जल का भी हाथ ज़ुरा
हुआ है इसके बिना काम नहीं चलने वाला।
जल प्रकृति का संरक्षण करती है आज कल बढती आबादी कल कारखाने प्रकृति का शोषण
कर रही है। हर मनुष्य केवल आपने बारे में सोच रहा है। केवल आपना फायदा देखता है आज
कल सभी इन्सान आराम तलब हो गए है खेती कोई करना नहीं चाहता है जिस से प्रकृति हरी
भरी रहे।धरती हरी भरी नहीं रहने के कारण जल संकट होता जा रहा है। शहरी वातावरण का
तो और बुरा हल है वे और वह का इन्सान कल कारखाने की तरह ही हो गया है। और वे मशीन
ही हो गए है । दिन प्रति दिन वे कमजोर और बीमार रह रहे है । क्योकि उनके जीवन में
बहुत ही प्रकार की कमी है वे पैसे कमाने में आइसे जुड़े हुआ है किस के आगे उनको कोई
भी चीज नहीं दिख रहा है भविष्य के ख्याल में खोये हुए है और वर्तमान का कोई फ़िक्र
नहीं है।
इन्सान भ्रषटयुग का प्रभाव इन्सान पर पर रहा है। वो असुंतुस्थ होता जा रहा है,
इन्सान की हालात उस मिर्ग के तरह हो गयी है जो जल की तलास में इधर उधर भटकता है और
कभी कभी तो सोना जैसे चमकने वाले रेत पानी दिखाई देता है और वह जब वह जाता है तो
वह कुछ नहीं रहता। थक हार कर वो वही दम तोर देता है।
इन्सान का मन और जल एक
ही प्रकार का है जल
का ये गुण है की जल को हम जैसे बनायेंगे वैसे ही बन जायेगा। चीनी डालेंगे तो मीठा
और नमक डालेगे तो नमकीन हो जायेगा और रंग डालेंगे तो रंगीन हो जायेगा। शरीर में जल
दो चार पांच दिन रह सकता है उसी तरह मन में नमक डालेंगे तो नफरत और चीनी डालेंगे
तो प्यार बनेगा । संतोष और आनंद डालेंगे तो जवान कलरफुल बन जाएगी।
क्रमश: .................................
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